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VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
‘प्रतियोगी’ कहानी में बाजारवाद का जादू और पारंपरिक व्यवसायों का संकट
Authors
बाबू लाल बेनीवाल
Abstract
नीलाक्षी सिंह की कहानी “प्रतियोगी” समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण रचना है, जिसमें बाजारवाद के विस्तार और उसके परिणामस्वरूप पारंपरिक व्यवसायों के संकट को अत्यंत सूक्ष्म, रूपकात्मक और मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। यह कहानी केवल आर्थिक परिवर्तन की कथा नहीं है, बल्कि वह सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक रूपांतरण की प्रक्रिया को भी उजागर करती है। कहानी का केन्द्रीय रूपक ‘बाजार’ एक जादूगर के रूप में उभरता है, जो मनुष्य की चेतना को सम्मोहित कर उसके स्वाद, इच्छाओं और जीवन-दृष्टि को बदल देता है। जलेबी, कचरी और पिअजुआ जैसे पारंपरिक खाद्य-व्यवसायों के माध्यम से लेखिका यह दिखाती हैं कि किस प्रकार स्थानीय, लोकजीवन से जुड़े व्यवसाय वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद की आँधी में हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। इस शोध-पत्र का उद्देश्य कहानी में निहित बाजारवादी जादू, प्रतिस्पर्धा की संस्कृति तथा उसके कारण उत्पन्न पारंपरिक व्यवसायों के संकट का विश्लेषण करना है।
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Pages:80-81
How to cite this article:
बाबू लाल बेनीवाल "‘प्रतियोगी’ कहानी में बाजारवाद का जादू और पारंपरिक व्यवसायों का संकट". National Journal of Advanced Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 80-81
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